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Sunday, 1 June 2014

A tribute to late Er. Pradeep Shekhawat...

यार हमारा,
था सबसे प्यारा,
कहां खो गया वो,
ढूंढे उसे ये जहां सारा ।


हंसता हंसाता था वो,
सबका मन लगाता था वो,
कभी सपने बड़े बड़े दिखाये,
कभी यूं ही रातों जगाता था वो ।


अपने पास क्यों तूने उसे बुलाया,
क्यों यूं तूने हमें रूलाया,
दूर हुआ जबसे है यार हमारा,
झूठा लागे है ये संसार तुम्हारा ।


न परवाह थी किसी कल के आने की,
आज में ही जिया करता था वो,
न थी ख्वाहीसें मंजिलों को पाने की,
बस राहें बनाना सिखाया करता था वो ।


सबका प्यारा था वो,
यार हमारा था वो,
ना बिछडा़ है
ना कभी बिछडे़गा वो ।


उसकी यादों में जिंदा है वो,
हमारी बातों में जिंदा है वो
उसके किये वादों में जिंदा है वो,
मेरे इरादों में जिंदा है वो ।


miss u so much dear,,, Your body is not alive today but you always live in our hearts.


:- कुँवर अवधेश शेखावत (धमोरा )

Friday, 7 March 2014

!! Dedicated to Daughters on International Women's Day !!

हां ये तेरी बदनसीबी है कि तू बेटी है ।

कभी घरवालों ने रोका,
कभी समाज ने टोका ।
बढाने चाहे जो कदम तूने आगे,
तो तुझे तेरे अपनो से ही मिला धोखा  ।।

हां ये तेरी बदनसीबी है कि तू बेटी है ।

क्यों हो गई तू इतनी कमजोर,
कभी होता है तुझपर भावनात्मक अत्याचार,
तो कभी होती है तू हवसी दरिंदो की शिकार ।
तुझे खुद को मजबूत होना ही होगा,
वरना दबा दी जाएगी तेरी हर पुकार ।

क्योंकि ये तेरी बदनसीबी है कि तू बेटी है
क्या सच में ये तेरी बदनसीबी है कि तू बेटी है...?

कितनी बेटीयों के नाम गिनाऊं,
जिन्होंने पायी है बुलन्दीयां ।
वो भी तो बेटी थी,
फिर कैसे छू ली उन्होंने बुलन्दीयां ।।

वो रुकी नहीं, डटी नहीं, चलती गई,
क्योंकि वो बेटी हैं ।
वो लड़ी समाज से, भीडी मुश्किलों से,
क्योंकि वो बेटी हैं ।
तो तू क्यों कोने में बैठी किस्मत को कोश रही,
क्योंकि तू बेटी है...?

Happy International Women's Day

:-  कुँवर अवधेश शेखावत (धमोरा )

Saturday, 1 March 2014

एक प्रण

(19 मार्च 2013 को "पथ-प्रेरक" में प्रकाशित)

चुप कर दो मुझे वरना मैं सत्य बोलुंगा,
हर एक के दिल में क्रांति की चिंगारी छोडुंगा ।
सुनकर मुझे पानी हुआ खुन भी उबाल खोलेगा,
यदि नहीं खोला तो तेरे खुन पर मेरा शक दोडेगा ।।

क्षत्रिय होकर क्यों तू शुद्र से कृत्य करता है,
धिक्कार है तेरे राजपूत होने पर जो तू दहेज की मांग करता है ।
अरे इस भिखारी को तो देखो, समझ नहीं आता,
दहेज में मिली गाङी में बैठकर यह अभिमान किस बात का करता है ।।

मैं पूछता हूँ क्या उस धनराशि से तेरी उम्र गुजर जाएगी ,
जो तेरी पत्नी तेरे लिए दहेज में लेकर आएगी ।
यदि तू जाती से राजपूत और चरित्र से क्षत्रिय है,
तो स्वयं देवी लक्ष्मी भी तेरे जीवन की कीमत ना लगा पायेगी ।।

समझ में नहीं आता फिर भी तू कैसे अपने स्वाभिमान को बेच डालेगा,
तेरा यह लालच एक और राजपूत परिवार को कर्जदार बना डालेगा ।
यदि आज भी तूने दहेज ना लेने का प्रण ना किया,
तो आज फिर से तू कुँवर अवधेश को रुला डालेगा ।।

:-  कुँवर अवधेश शेखावत (धमोरा )

नोट:- कविता में पर्युक्त शुद्र शब्द से आशय किसी जाती विशेष से नहीं है । यहां पर्युक्त शुद्र शब्द से आशय उन लोगों से हैं जिनकी प्राथमिक आवश्यकताएं (रोटी,कपड़ा,मकान) भी पूर्ण नहीं हो पाती है ।।

Saturday, 15 February 2014

!! Dadicated to My Big Brother (Cousin) on My 20th Birthday (1 January 2014) !!

काबिल नहीं मेरी कलम की कुछ लिखे आपके बारे में,
क्षमा चाहता हूं फिर भी लिख रहा हूं ।
सुकुं मिल रहा है लिखकर इन शब्दों की वफाओं को,
लिखना नहीं आता अभी तो लिखना सिख रहा हूं ।।

सोच रहा हूं कहां से शब्द वो लाऊं,
जो झंकारे दास्तां लिख दूं ।
इजाजत आप मुझे दे दो,
इजहारे मैं बयां कर दूं ।।

ये दुनिया है इक मेला इस मेले में कई तरह के लोग मिले,
हर तरह के मिले कुछ अच्छे तो कुछ बुरे भी मिले ।
कुछ का साथ अच्छा लगा जो आज भी साथ हैं,
और कुछ से सदा के लिए रह गए शिकवे गिले ।।

इसी मेले कि भीड़ में टकराव एक दिन आपसे हुआ,
और चल पड़े बातों के, मुलाकातों के शिलशिले ।
जिन्दगी के इस सफर में हर कोई चाहता है साथ किसी नूर का मिले,
कोशिश हमारी भी रहेगी इस सफर में मौका किसी शिकायत का ना मिले ।।

चाहता हूं हर वो फरियाद कबुल हो आपकी जो आपका दिल चाहे ।
और फरियाद पुछने खुदा खुद चलकर आपके पास आये ।।

आपके सिद्धान्तों से आप मुझे मर्यादापुरुषोत्तम राम लगे,
तो राजनैतिक वार्ताओं से राजनीति के जनक श्याम लगे ।
आपके शीतल ह्रदय के कारण, हर किसी के दिल में आदर भाव जगे,
और अगर बात करुं गुस्से की, उसका डर तो भाभीसा को भी लगे ।।

( भाभीसा )

जिन्दगी की राह के इक मोड़ पर आप इनसे इस कदर मिले,
कि पुरी कायनात में दो दिलों के एक होने का गीत गूंज गया ।
दो राही एक हुए, साथ गिरने, साथ उठने, साथ चलने के लिए,
कुछ कह लिया, कुछ सुन लिया और कुछ बोझ दोनों का बंट गया ।।

सीधी-साधी राजस्थानी गुड़िया जैसी हैं आप ।
प्यारी-प्यारी जादू की पुड़िया जैसी हैं आप ।।

क्या लिखूं आपके बारे में -
चेहरे पर एक अजब की मासूमियत,
तो देखी हैं आंखों में गहराई आपके ।
पता नहीं कितना कुछ छुपा रखा है अपने अन्दर,
एक अजीब सी सच्चाई देखी है दिल में आपके ।।

लगता है जैसे किसी जिज्ञासा को मारा है आपने,
लेकिन दुःखी ना होना कभी ये सोचकर की कुछ हारा है आपने ।
मेरी नजर में तो बहुत कुछ किया है आपने,
हर कदम पर साथ रहकर भैया की राह को जो संवारा है आपने ।।

अपनों की खुशी के लिए खुद की खुशीयों को नकारा है आपने,
क्योंकि हर रिस्ते की महता को बेखुबी समझा है आपने ।
शायद कुछ पाने के लिए बहुत कुछ खोया है आपने,
फिर भी खुशकिस्मत हैं आप क्योंकि राम जैसा पति जो पाया है आपने ।।

दुआ है सफर आप दोनों का सुहाना हो,
मन चाहा मीत मिले ।
और शायरी तभी मन को भाये,
जब सुर को संगीत मिले ।।

                                             :- कुँवर अवधेश शेखावत (धमोरा)

Friday, 14 February 2014

!! Dadicated to My Mother on My 20th Birthday !!

(1st January 2014 on my 20th Birthday) आज उस देवी के लिए कुछ तुकबन्दीयां बनाने बेठा हूं जिसने 9 माह अपनी कौख में रखकर आज के दिन मुझे जन्म दिया । जिसने हर वक्त अपनी खुशी से पहले मेरी खुशी का खयाल रखा है । 

क्या लिखूं तेरे लिए मां, तेरी तो कथा अनादि है,
ना है तू मेरे शब्दों की मोहताज, ना तू कोई अध्याय है ।
मैं कितना भी बडा क्यों न बन जाऊं चाहे ,
लेकिन मेरे जीवन में तेरा ना कोई पर्याय है ।।

कितना लिखूं तेरे लिए, जितना लिखूं अल्प है,
तेरे प्यार, तेरी ममता का ना मेरे पास कोई विकल्प है ।
कर्ज तेरा ना चुका सकुंगा मैं कभी ,लेकिन
ना आने दूंगा तेरी आंखों में अश्रु, आज ये लिया मैंने संकल्प है ।।

खुदा करे, माँ तेरे इस स्नेह को कभी ना खोऊं मैं ।
तेरे आंचल की छांव से जुदा कभी ना होऊं मैं ।।

तू ही गुरु, तू ही रब है मेरी, जो तूने सिखाये मुझे पाठ महान,
खुदा भी उसके रास्ते नहीं रोकता, जो करता है मातृ-शक्ति का सम्मान ।
ऊंचा-निचा, छोटा-बडा कोई नहीं, हैं सब इंसान,
बुरा कभी किसी का ना करना बेटा, देख रहा है भगवान ।।

आँखें नम हो जाती है मां, जब भी आती है तेरी ये बातें याद,
खुश रहे हमेशा मेरी मां, ए-खुदा कबुल कर मेरी ये फरियाद ।
तूने सब सिखाया मुझे, पर खुद से दूर रहना सिखाना भूल गयी,
बहुत आती है तेरी याद, बस कैसे तुझे बताऊं, ये बताना भूल गयी ।।

तू ही है देवी, तू ही पूजा, तू ही मंत्रो का जाप है मां,
नहीं करने देता कुछ गलत मुझे, हरदम तेरे साथ होने का जो अहसास है मां ।
तू ही लोरी है, तू ही गीत है, तू ही प्यारी सी धाप है मां,
नहीं परवाह तेरे अवधेश को दुनिया की, इतना ही काफी है तुझे जो विश्वास है मां ।।

 :- कुँवर अवधेश शेखावत (धमोरा)

Thursday, 13 February 2014

N Emptiness

How calm the day, how dark this night, How can i see my future,with my tearful sight.. I always puzzled in this world and its sleight, Hurted a thousand of times, but still keep quiet.. Your campaign of my brain wash give me a new hope, Your thoughts grown in my mind as a positive crop.. After departs from you,i feel all the relations are fake, People combine with each other, only for their sake.. After a long years of struggle, when I'll defeated by my fate, I'll stop my journey and become late.. When will you come to me, hug me tight, Don't try to be stop, bless me, for my free flight.. ..

:- Priyanka Yadav

Sunday, 9 February 2014

!! Dadicated to Vidhya Bharti School, Sikar !!

अकसर उन दिनों की यादें मुझे रुला जाती है,
जाता हूँ जब भी सीकर याद विद्या भारती की बहुत आती है ।
वो मेरा गौरव व मुरारी को सताना,
रुठे दोस्तों को पंकज का मनाना ।

वो अशोक सर की बाईक की सवारी,
वो संगीता, ट्रिंकल और स्नेहा की यारी ।
कभी मेरा निशा से झगड़ा तो कभी रोहित कुमावत से लफङा ।
वो क्लास की मस्ती और निशा व रोहित से फिर दोस्ती ।
वो महेश का मुझे समझाना,
पढले भाई ये समय वापस ना आना ।
वो मेरा राजपूत होस्टल में रहना,
कभी अनुज-अजय का तो कभी किसी ओर का मिलने आना ।

वो निशा का गुस्सा वो दिपीका का रौब,
और हमारा दोस्तों के साथ पार्टीयां करने का शौक ।
वो हनी का लव गुरु बनना
और कुछ दोस्तों का प्यार में पड़ना
अरे प्यार नहीं रे UPSC का इम्तेहान था,
किसी का भी क्लीयर नहीं हुआ साला ।

शोभीत व शहजाद के वो dialog और रोहित सांवलका की comedy
सोचते थे कभी-२ यूँहि चलती रहे मस्ती और भाड़ में जाये study
रक्षा हमेशा ही क्न्फ्यूज रहती
कभी arts लेती तो कभी फिर commerce में आ जाती ।
किसी लड़की को देख दोस्तों को "तेरी भाभी/तेरी बहन बोलकर चिडाना,
तो कभी सबके साथ मिलकर शिक्षक दिवस व बाल दिवस की शोपींग करके लाना ।

वो संजू व पिंकी की overacting
और वो लड़कों की missunderstanding
वो कोमल व कविता simplysity
और रुपा व निकीता की sincerity
वो स्नेहा का लड़कों से बात ना करना,
और लड़कों का उसकी इसी अदा पर दिवाना हो जाना ।
कक्षा में पिंकी को पथरी का दर्द आना,
और अचानक सबका डर जाना ।

सबके दिल के करीब थे account वाले विजेन्द्र सर,
और अगर सपने में भी किसी के आ गये PTI जी तो लगता था बड़ा डर ।
लड़के लड़की की दोस्ती में रमा मैम बनी थी कांटा
और फिर PTI सर का पड़ता जोरदार चांटा ।
वो मुरारी की पेंट और श्रीपाल का सेंट
वो मेरा 7 में से 4 दिन स्कुल जाना,
और फिर भी कक्षा में निंद लेते रहना ।
मेरा और मुरारी का होस्टल छोड़ room पर रहना
Room पर अकसर अजय,अनुज,रणजीत व महेश का आना
और वहीं मोहित,प्रमोद व बनवारी के साथ गप्पें लड़ाना ।

वो मेरी बकवास और full on timepass
वो हनी के suggestion और मेरे rejection
वो संजू की नाराजगी और थोडी देर में वापसी
वो विनायक का काफी-सोप
और मन में किसी के देख लेने क खोफ ।

वो मुरारी का समझाना व मेरा समझ ना पाना
और मेरा मधुसुधन व बनवारी के साथ पैदल खाटुश्यामजी जाना
वहाँ सबके जूते खो जाना ।
वो छोटी सी बात पर विक्रम व रवी से झगड़ा होना
और बात पुलिस केस तक पहुँच जाना
फिर भी हमारी वापस से दोस्ती हो जाना
वो बिना काम रवी के साथ जयपुर आना
और 2 दिन मस्ती करके वापस लौट जाना ।

वो आकाश के घर का उपर वाला कमरा
वहां बैढकर इस तरह से बातें करना जैसे हो पुरा सीकर हमारा ।
वो संजू, निशा व दिपीका का इतराना
और हमारा हार जाना ।
वो संगीता की hight
और वो दोस्तों की आपस मे fight
कभी class test में top आना तो कभी पीछे बैठकर teachers की खिल्ली उड़ाना
दिन भर हर तरह से मस्ती करना,
फिर भी मुरारी को best student का award मिल जाना ।

वो बलवन्त सर के suggestion
और वो marks ज्यादा लाने का competition
सबकी कोशिश गौरव से जीतने की
और नतीजा हार का ।

हर रोज समझाते रहते थे मुझे गांधीजी सर
कि पढले बेटा कक्षा में फालतू की नेतागीरी ना कर
वो प्रकाश,ट्रिंकल व दिपेश से मेरा बहन वाला प्यार
क्या खुब जमेगा रंग जब फिर से हम सब मिलेंगे यार ।

वो संदीप और राहुल की चुप्पी
सच में यार उन दिनों हम थे कितने हैप्पी
कभी शर्माजी की oyes व उधार का सामान
तो कभी मिलन के मिठ्ठे पकवान ।

वो कुछ खट्टी सी और मिट्ठी सी यादें
और वो Lunchtime की बातें याद आती है
जाता हूं जब भी सीकर याद विद्या भारती की बहुत आती है ।।

Missing my School days and buddies..... god bless u all much love & respect...

                                                            :- कुँवर अवधेश शेखावत (धमोरा)

Tuesday, 4 February 2014

बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाओ के साथ माँ शारदे से एक प्रार्थना

माँ शारदे इतनी कृपा कर दे ,
मेरी लेखनी में थोड़ी ताकत भर दे |

वतन के कुछ काम आ जाऊ,
सोयी अवाम को शब्दों से जगा जाऊ ,
लिए कलम तलवारों से टकरा जाऊ,
मेरे दिल में वो हिमाकत भर दे |

इंसानों में इंसानियत जगा जाऊ ,
जंहा में अमन की लौ जला जाऊ ,
फिज़ाओ में शांति की लहर बहा जाऊ ,
मेरे शब्दों में वो बरकत भर दे |

“विशाल”जो लिखु बेबाक लिख जाऊ,
दिलो के दर्दो में झांक पाऊ,
मन के भावो को भी पढ़ जाऊ ,
मेरी ज्ञानेन्द्रियो में वो नजाकत भर दे ,

माँ शारदे इतनी कृपा कर दे ,
मेरी लेखनी में थोड़ी ताकत भर दे |
                                   
                       :- विशाल सर्राफ धमोरा 

Monday, 3 February 2014

साँपो की राजनीती

आजकल अख़बार पढ़कर सापों के बीच एक ख़ुशी फैली हुयी है ,
जहरीले उस माहोल में एक मदहोशी फैली हुयी है |

पुराने से पुराने दस्तावेज़ खंगाले जा रहे है ,
लापता हुए ‘जहरीलो’ के नाम ढूंढे जा रहे है |

एक उम्मीद से उनकी आँखे चमकी हुयी है,
की राजनीती में उनकी बिरादरी भी डटी हुयी है |

बड़े-बुढे उनकी पहचान के  कयास लगा रहे है ,
बच्चे त्यौहार की उम्मीद में ख़ुशी मना रहे है |

साँप राजनीती में है जब से नेवलो ने सुना है ,
तब से उनकी प्रजाति बिलों में अटकी हुयी है |

साँप बिलों से निकल आतंक फैला रहें है,
आखिर उनके रिश्तेदार देश चला रहे है |

इंसानी दिलो में मातम की कीलें धंसी हुयी है ,
“विशाल” उनके जीवन की डोर साँपो के बीच फंसी हुयी है |

                          :- विशाल सर्राफ ‘धमोरा’

Sunday, 2 February 2014

हार और जीत

इस एक हार से खुद को इस कदर न निराश करो,
जीत मिल जायेगी देर सबेर एक और प्रयास करो |

एक हार से जिंदगी नही रुक जाती है,
सच है कई मुश्किलों के बाद ही मंजिल मिल पाती है |

तुम हर पल हर वक़्त यु मायूसी की ना बात करो,
जीत मिल जायेगी देर सबेर एक और प्रयास करो |

हार दोस्त है तुम्हारी जो जितना सिखाती है,
एक लम्बी रात के बाद ही तो नई सुबह आती है |

राजा और मकड़ी की गाथा का मन में अहसास करो,
जीत मिल जायेगी देर सबेर एक और प्रयास करो |

हार एक मशाल है जो राह दिखाती है,
हार के कदमो पर चलकर ही तो जीत द्वार पे आती है |

ना छोडो उम्मीदों का दामन फिर से नयी आस करो,
जीत मिल जायेगी देर सबेर एक और प्रयास करो |

हार एक दीया है जिसमे उम्मीदों की बाती है,
जब कोशिशो का तेल डालता है तभी रौशनी मिल पाती है |

‘विशाल’ की इन बातो पर दिल से विश्वास करो,
जीत मिल जायेगी देर सबेर एक और प्रयास करो |

                                       :- विशाल सर्राफ " धमोरा "

Monday, 27 January 2014

इतिहास ना बदल जाए

(19 अक्टूबर 2013 को पथ-प्रेरक में प्रकाशित )
आज फिर कुंवर अवधेश के शब्द अपनों को दर्द न दे जाए,
आज फिर कहीं लिखते- लिखते रोना न आ जाए ।
जरा वक्त निकाल कर सोचो कहाँ थे हम और अब कहाँ आ गये है,
डर रहा हूँ यह सोच कर की कहीं अस्तित्व हमारा भी ना खो जाए ।।

कुछ चन्द लोगों को मान लिया समाज का ठेकेदार हमने ,
कहीं उन ठेकेदारों के हाथों समाज नीलाम न हो जाए।
नही लेता इन अपनों के नाम सरेआम इस डर से ,
की कही नाम उनका बदनाम ना हो जाए ।।

कई दशक हो गये सहन करते हुए अब तो उठो ,
कही अत्याचार सहना हमारा स्वभाव न बन जाए।
कर रहा हूँ कोशिश अपना अतीत वापस लाने की ,
कहीं इस कोशिस मे नाम मेरा विरोधियों मे ना जुड़ जाए ।।

सर कटाये है क्षत्रियों ने जोहर किये है क्षत्राणीयों ने,अब तो उठो ,
कही लोगों को खून की पवित्रता पर शक होने ना लग जाए ।
मर गये अपने पूर्वज क्षत्रियता निभाते निभाते ,
कोशिश करो उनके प्रयास कागजों मे सिमट कर ना रह जाए ।।

मांगता हूँ दुआ जब भी देखता हूँ वर्त्तमान स्थिति को ,
की कहीं शुद्र सा हमारा भविष्य ना हो जाए ।
कर रहा हूँ इंतजार अपनों के बदलने का,
कही इस इंतजार मे जिंदगी तमाम ना हो जाए ।।

डर रहा हूँ वर्तमान चाल चलन को देख कर,
की कही संस्कृति हमारी भी लुप्त ना हो जाए ।
चिन्तित होता हूँ जब भी सोचता हूँ अकेले में ,
की कही भविष्य मे हम फिर से गुलाम ना हो जाए ।।

यह लोकतन्त्र है यहाँ सरकारे बदलेंगी तख्त बदलेंगे ,
हम भी कही इन लोकतान्त्रिक पार्टियों के दास ना बन जाएँ ,
सत्ता मे बने रहना है तो अपनी एकता की ताकत दिखाओ ।
वरना कहीं जोधा-अकबर की तरह संपूर्ण इतिहास ना बदल जाए ।।

                                लेखक:-  कुँवर अवधेश शेखावत (धमोरा )

नोट:- कविता में पर्युक्त शुद्र शब्द से आशय किसी जाती विशेष से नहीं है । यहां पर्युक्त शुद्र शब्द से आशय उन लोगों से हैं जिनकी प्राथमिक आवश्यकताएं (रोटी,कपड़ा,मकान) भी पूर्ण नहीं हो पाती है ।।